ग़ज़ल
नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे
नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-मली मुख-चुम्बन-रोली ।
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,एक-वसन रह गई मन्द हँस अधर-दशन अनबोली-कली-सी काँटे की तोली ।
मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली-बनी रति की छवि भोली ।
बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,उठी सँभाल बाल, मुख-लट,पट, दीप बुझा, हँस बोलीरही यह एक ठिठोली ।
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