ग़ज़ल

प्रपात के प्रति

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' · सब कलाम देखें
अंचल के चंचल क्षुद्र प्रपात !मचलते हुए निकल आते हो;उज्जवल! घन-वन-अंधकार के साथखेलते हो क्यों? क्या पाते हो ?
अंधकार पर इतना प्यार,क्या जाने यह बालक का अविचारबुद्ध का या कि साम्य-व्यवहार !तुम्हारा करता है गतिरोधपिता का कोई दूत अबोध-किसी पत्थर से टकराते होफिरकर ज़रा ठहर जाते हो;
उसे जब लेते हो पहचान-समझ जाते हो उस जड़ का सारा अज्ञान,फूट पड़ती है ओंठों पर तब मृदु मुस्कान;बस अजान की ओर इशारा करके चल देते हो,भर जाते हो उसके अन्तर में तुम अपनी तान ।
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