ग़ज़ल
अट नहीं रही है
अट नहीं रही हैआभा फागुन की तनसट नहीं रही है।
कहीं साँस लेते हो,घर-घर भर देते हो,उड़ने को नभ में तुमपर-पर कर देते हो,आँख हटाता हूँ तोहट नहीं रही है।
पत्तों से लदी डालकहीं हरी, कहीं लाल,कहीं पड़ी है उर में,मंद - गंध-पुष्प माल,पाट-पाट शोभा-श्रीपट नहीं रही है।
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