ग़ज़ल
नर्गिस
बीत चुका शीत, दिन वैभव का दीर्घतरडूब चुका पश्चिम में, तारक-प्रदीप-करस्निग्ध-शान्त-दृष्टि सन्ध्या चली गई मन्द मन्दप्रिय की समाधि-ओर, हो गया है रव बन्दविहगों का नीड़ों पर, केवल गंगा का स्वरसत्य ज्यों शाश्वत सुन पड़ता है स्पष्ट तर,बहता है साथ गत गौरव का दीर्घ कालप्रहत-तरंग-कर-ललित-तरल-ताल।
चैत्र का है कृष्ण पक्ष, चन्द्र तृतीया का आजउग आया गगन में, ज्योत्स्ना तनु-शुभ्र-साजनन्दन की अप्सरा धरा को विनिर्जन जानउतरी सभय करने को नैश गंगा-स्नान।
तट पर उपवन सुरम्य, मैं मौनमनबैठा देखता हूँ तारतम्य विश्व का सघन;जान्हवी को घेर कर आप उठे ज्यों करारत्यों ही नभ और पृथ्वी लिये ज्योत्स्ना ज्योतिर्धार,सूक्ष्मतम होता हुआ जैसे तत्व ऊपर कोगया, श्रेष्ठ मान लिया लोगों ने महाम्बर को,स्वर्ग त्यों धरा से श्रेष्ठ, बड़ी देह से कल्पना,श्रेष्ठ सृष्टि स्वर्ग की है खड़ी सशरीर ज्योत्स्ना।
:::(२)युवती धरा का यह था भरा वसन्त-काल,हरे-भरे स्तनों पर पड़ी कलियों की माल,सौरभ से दिक्कुमारियों का मन सींचकरबहता है पवन प्रसन्न तन खींचकर।पृथ्वी स्वर्ग से ज्यों कर रही है होड़ निष्काममैंने फेर मुख देखा, खिली हुई अभिरामनर्गिस, प्रणय के ज्यों नयन हों एकटकमुख पर लिखी अविश्वास की रेखाएँ पढ़स्नेह के निगड़ में ज्यों बँधे भी रहे हैं कढ़।कहती ज्यों नर्गिस--"आई जो परी पृथ्वी परस्वर्ग की, इसी से हो गई है क्या सुन्दरतर?
पार कर अन्धकार आई जो आकाश पर,सत्य कहो, मित्र, नहीं सकी स्वर्ग प्राप्त कर?कौन अधिक सुन्दर है--देह अथवा आँखें?चाहते भी जिसे तुम--पक्षी वह या कि पाँखें?स्वर्ग झुक आये यदि धरा पर तो सुन्दरया कि यदि धरा चढ़े स्वर्ग पर तो सुघर?"बही हवा नर्गिस की, मन्द छा गई सुगन्ध,धन्य, स्वर्ग यही, कह किये मैंने दृग बन्द।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.