ग़ज़ल
मरा हूँ हज़ार मरण
मरा हूँ हजार मरणपाई तब चरण-शरण ।
फैला जो तिमिर जालकट-कटकर रहा काल,आँसुओं के अंशुमाल,पड़े अमित सिताभरण ।
जल-कलकल-नाद बढ़ाअन्तर्हित हर्ष कढ़ा,विश्व उसी को उमड़ा,हुए चारु-करण सरण ।
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