ग़ज़ल
भर देते हो
भर देते होबार-बार, प्रिय, करुणा की किरणों सेक्षुब्ध हृदय को पुलकित कर देते हो ।
मेरे अन्तर में आते हो, देव, निरन्तर,कर जाते हो व्यथा-भार लघुबार-बार कर-कंज बढ़ाकर;
अंधकार में मेरा रोदनसिक्त धरा के अंचल कोकरता है क्षण-क्षण-
कुसुम-कपोलों पर वे लोल शिशिर-कणतुम किरणों से अश्रु पोंछ लेते हो,नव प्रभात जीवन में भर देते हो ।
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