ग़ज़ल
जी हाँ , लिख रहा हूँ
जी हाँ, लिख रहा हूँ ...बहुत कुछ ! बहोत बहोत !!ढेर ढेर सा लिख रहा हूँ !मगर , आप उसे पढ़ नहींपाओगे ... देख नहीं सकोगेउसे आप !
दरअसल बात यह है किइन दिनों अपनी लिखावटआप भी मैं कहॉ पढ़ पाता हूँनियोन-राड पर उभरती पंक्तियों कीतरह वो अगले ही क्षणगुम हो जाती हैंचेतना के 'की-बोर्ड' पर वो बसदो-चार सेकेंड तक हीटिकती है ....कभी-कभार ही अपनी इसलिखावट को कागज़ परनोट कर पता हूँस्पन्दनशील संवेदन कीक्षण-भंगुर लड़ियाँसहेजकर उन्हें और तकपहुँचाना !बाप रे , कितना मुश्किल है !आप तो 'फोर-फिगर' मासिक -वेतन वाले उच्च-अधिकारी ठहरे,मन-ही-मन तो हसोंगे ही,की भला यह भी कोईकाम हुआ , की अनाप-शनाप ख़यालों कीमहीन लफ्फाजी हीकरता चले कोई -यह भी कोई काम हुआ भला !
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