ग़ज़ल
आये दिन बहार के
'स्वेत-स्याम-रतनार' अँखिया निहार केसिण्डकेटी प्रभुओं की पग-धूर झार केलौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार केखिले हैं दाँत ज्यों दाने अनार केआए दिन बहार के !
बन गया निजी काम-दिलाएंगे और अन्न दान के, उधार केटल गये संकट यू.पी.-बिहार केलौटे टिकट मार केआए दिन बहार के !
सपने दिखे कार केगगन-विहार केसीखेंगे नखरे, समुन्दर-पार केलौटे टिकट मार केआए दिन बहार के !
रचनाकाल : 1966
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