ग़ज़ल

कोहरे में शायद न भी दीखे

नागार्जुन · सब कलाम देखें
वो गयावो गयाबिल्कुल ही चला गयापहाड़ की ओट में
लाल-लाल गोला सूरज काशायद सुबह-सुबहदीख जाए पूरब मेंशायद कोहरे में न भी दीखे !
फ़िलहाल वोडूबता-डूबता दीख गया !दिनान्त का आरक्त भास्करजेठ के उजले पाख की नौवीं साँझपसारेगी अपना आँचल अभी-अभीहिम्मत न होगी तमिस्रा कोधरती पर झाँकने की !
सहमी-सहमी-सी वो प्रतीक्षा करेगीउधर, उस ओरखण्डहर की ओट में !
जी हाँ, परित्यक्त राजधानी केखण्डहरोंवाले उन उदास झुरमुटों मेंतमिस्रा करेगी इन्तज़ारदो बजे रात तकयानि तिथिक्रम के हिसाब से,आधी धुली चाँदनीतब तक खिली रहेगीफिर, तमिस्रा का नम्बर आएगा !यानि अन्धकार का !
(1984 में रचित)
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