ग़ज़ल
जन मन के सजग चितेरे
कवि केदारनाथ अग्रवाल के लिए
हंसते-हंसते, बातें करतेकैसे हम चढ़ गए धड़ाधड़बम्बेश्वर के सुभग शिखर परमुन्ना रह-रह लगा ठोकनेतो टुनटुनिया पत्थर बोला —हम तो हैं फ़ौलाद, समझना हमें न तुम मामूली पत्थरनीचे है बुन्देलखण्ड की रत्न-प्रसविनी भूमिशीश पर गगन तना है नील मुकुट-सानाहक़ नहीं हमें तुम छेड़ो…फिर मुन्ना कैमरा खोलकरउन चट्टानों पर बैठे हम दोनों की छवियाँ उतारता रहा देर तकनीचे देखा :तलहटियों मेंछतों और खपरैलों वालीसादी-उजली लिपी-पुती दीवारोंवालीसुन्दर नगरी बिछी हुई हैउजले पालों वाली नौकाओं से शोभितश्याम-सलिल सरवर है बाँदानीलम की घाटी में उजला श्वेत कमल-कानन है बाँदा !अपनी इन आँखों पर मुझकोमुश्किल से विश्वास हुआ थामुँह से सहसा निकल पड़ा —क्या सचमुच बाँदा इतना सुन्दर हो सकता हैयू.पी. का वह पिछड़ा टाउन कहाँ हो गया ग़ायब सहसाबाँदा नहीं, अरे यह तो गन्धर्व नगर है…
उतरे तो फिर वही शहर सामने आ गया !अधकच्ची दीवारोंवाली खपरैलों की ही बहार थीसड़कें तो थीं तंग किंतु जनता उदार थीबरस रही थी मुस्कानों से विवश ग़रीबीमुझे दिखाई पड़ी दुर्दशा ही चिरजीवीओ जन-मन के सजग चितेरेसाथ लगाए हम दोनों ने बाँदा के पच्चीसों फेरेजनसंस्कृति का प्राणकेन्द्र पुस्तकागार वहवयोवृद्ध मुंशी जी से जो मिला प्यार वहकेन नदी का जल-प्रवाह, पोखर नवाब कावृद्ध सूर्य के चञ्चल शिशु भास्वर छायानटसांध्य घनों की सतरंगी छवियों का जमघटरॉड ज्योति से भूरि-भूरि आलोकित स्टेशनवहीं पास में भिखमंगों का चिर-अधिवेशनकाग़ज़ के फूलों पर ठिठकी हुई निगाहेंबसें छबीली, धूल भरी वे कच्ची राहेंद्वारपाल-सा जाने कब से नीम खड़ा थाताऊजी थे बड़े कि जाने वही बड़ा थानेह-छोह की देवी, ममता की वह मूरतभूलूँगा मैं भला बहूजी की वह सूरत ?मुन्नू की मुस्कानों का प्यासा बेचाराचिकना-काला मखमल का वह बटुआ प्याराजी, रमेश थे मुझे ले गए केन नहानेभूल गया उस दिन दतुअन करना क्यों जानेशिष्य तुम्हारे शब्द-शिकारीतरुण-युगल इक़बाल-मुरारी !ऊँचे-ऊँचे उड़ती प्रतिभा थी कि परी थीमेरी ख़ातिर उनमें कितनी ललक भरी थीरह-रह मुझको याद आ रहे मुन्ना दोनोंतरुणाई के ताज़ा टाइप थे वे मोनो
बाहर-भीतर के वे आँगनफले पपीतों की वह बगियागोल बाँधकर सबका वह ‘दुखमोचन’ सुननाकड़ी धूप, फिर बूँदाबाँदीफिर शशि का बरसाना चाँदी…चितकबरी चाँदनी नीम की छतनारी डालों सेछन-छन कर आती थीआसमान था साफ़, टहलने निकल पड़े हम
मैं बोला : केदार, तुम्हारे बाल पक गए !‘चिन्ताओं की घनी भाप में सीझे जाते हैं बेचारे’—तुमने कहा, सुनो नागार्जुन,दुख-दुविधा की प्रबल आँच मेंजब दिमाग़ ही उबल रहा होतो बालों का कालापन क्या कम मखौल है ?ठिठक गया मैं, तुम्हें देखने लगा ग़ौर से…गौर-गेहुँआ मुख-मण्डल चाँदनी रात में चमक रहा थाफैली-फैली आँखों में युग दमक रहा थालगा सोचने—तुम्हें भला क्या पहचानेंगे बाँदावाले !तुम्हें भला क्या पहचानेंगे साहब काले !तुम्हें भला क्या पहचानेंगे आम मुवक्किल !तुम्हें भला क्या पहचानेंगे शासन की नाकों पर के तिल !तुम्हें भला क्या पहचानेंगे ज़िला अदालत के वे हाक़िम !तुम्हें भला क्या पहचानेंगे मात्र पेट के बने हुए हैं जो कि मुलाज़िम !प्यारे भाई, मैंने तुमको पहचाना हैसमझा-बूझा है, जाना है…केन कूल की काली मिट्टी, वह भी तुम हो !कालिञ्जर का चौड़ा सीना, वह भी तुम हो !ग्रामवधू की दबी हुई कजरारी चितवन, वह भी तुम हो !कुपित कृषक की टेढ़ी भौंहें, वह भी तुम हो !खड़ी सुनहली फ़सलों की छवि-छटा निराली, वह भी तुम हो !लाठी लेकर कालरात्रि में करता जो उनकी रखवाली वह भी तुम हो !
जनगण-मन के जाग्रत शिल्पी,तुम धरती के पुत्र : गगन के तुम जामाता !नक्षत्रों के स्वजन कुटुम्बी, सगे बन्धु तुम नद-नदियों के !झरी ऋचा पर ऋचा तुम्हारे सबल कण्ठ सेस्वर-लहरी पर थिरक रही है युग की गंगाअजी, तुम्हारी शब्द-शक्ति ने बाँध लिया है भुवनदीप कवि नेरूदा कोमैं बड़भागी, क्योंकि प्राप्त है मुझे तुम्हारानिश्छल-निर्मल भाईचारामैं बड़भागी, तुम जैसे कल्याण मित्र का जिसे सहारामैं बड़भागी, क्योंकि चार दिन बुन्देलों के साथ रहा हूँमैं बड़भागी, क्योंकि केन की लहरों कुछ देर बहा हूँबड़भागी हूँ, बाँट दिया करते हो हर्ष-विषादबड़भागी हूँ, बार-बार करते रहते हो याद
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