ग़ज़ल

अन्न पचीसी के दोहे

नागार्जुन · सब कलाम देखें
सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बडे ही गूढ़अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़
कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथबन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ
छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूटमिल सकती कैसे भला, अन्नचोर को छूट
आज गहन है भूख का, धुंधला है आकाशकल अपनी सरकार का होगा पर्दाफ़ाश
नागार्जुन-मुख से कढे साखी के ये बोलसाथी को समझाइये रचना है अनमोल
अन्न-पचीसी मुख्तसर, लग करोड़-करोड़सचमुच ही लग जाएगी आँख कान में होड़
अन्न्ब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रहम पिशाचऔघड मैथिल नागजी अर्जुन यही उवाच
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