ग़ज़ल
प्रेत का बयान
"ओ रे प्रेत -"कडककर बोले नरक के मालिक यमराज-"सच - सच बतला !कैसे मरा तू ?भूख से , अकाल से ?बुखार कालाजार से ?पेचिस बदहजमी , प्लेग महामारी से ?कैसे मरा तू , सच -सच बतला !"खड़ खड़ खड़ खड़ हड़ हड़ हड़ हड़काँपा कुछ हाड़ों का मानवीय ढाँचानचाकर लंबे चमचों - सा पंचगुरा हाथरूखी - पतली किट - किट आवाज़ मेंप्रेत ने जवाब दिया -
" महाराज !सच - सच कहूँगाझूठ नहीं बोलूँगानागरिक हैं हम स्वाधीन भारत केपूर्णिया जिला है , सूबा बिहार के सिवान परथाना धमदाहा ,बस्ती रुपउलीजाति का कायस्थउमर कुछ अधिक पचपन साल कीपेशा से प्राइमरी स्कूल का मास्टर था-"किन्तु भूख या क्षुधा नाम हो जिसकाऐसी किसी व्याधि का पता नहीं हमकोसावधान महाराज ,नाम नहीं लीजिएगाहमारे समक्ष फिर कभी भूख का !!"
निकल गया भाप आवेग कातदनंतर शांत - स्तंभित स्वर में प्रेत बोला -"जहाँ तक मेरा अपना सम्बन्ध हैसुनिए महाराज ,तनिक भी पीर नहींदुःख नहीं , दुविधा नहींसरलतापूर्वक निकले थे प्राणसह न सकी आँत जब पेचिश का हमला .."
सुनकर दहाड़स्वाधीन भारतीय प्राइमरी स्कूल केभुखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षक प्रेत कीरह गए निरूत्तरमहामहिम नर्केश्वर |
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