ग़ज़ल

घन-कुरंग

नागार्जुन · सब कलाम देखें
नभ में चौकडियाँ भरें भलेशिशु घन-कुरंगखिलवाड़ देर तक करें भलेशिशु घन-कुरंगलो, आपस में गुथ गए खूबशिशु घन-कुरंगलो, घटा जल में गए डूबशिशु घन-कुरंगलो, बूंदें पडने लगीं, वाहशिशु घन-कुरंगलो, कब की सुधियाँ जगीं, आहशिशु घन-कुरंगपुरवा सिहकी, फिर दीख गएशिशु घन-कुरंगशशि से शरमाना सीख गएशिशु घन-कुरंग
''१९६४ में लिखित''
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