ग़ज़ल
खुरदरे पैर
खुब गएदूधिया निगाहों मेंफटी बिवाइयोंवाले खुरदरे पैर
धँस गएकुसुम-कोमल मन मेंगुट्ठल घट्ठोंवाले कुलिश-कठोर पैर
दे रहे थे गतिरबड़-विहीन ठूँठ पैडलों कोचला रहे थेएक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन चक्रकर रहे थे मात त्रिविक्रम वामन के पुराने पैरों कोनाप रहे थे धरती का अनहद फासलाघण्टों के हिसाब से ढोये जा रहे थे !
देर तक टकराएउस दिन इन आँखों से वे पैरभूल नहीं पाऊंगा फटी बिवाइयाँखुब गईं दूधिया निगाहों मेंधँस गईं कुसुम-कोमल मन में
''१९६१ में लिखी गई''
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh