ग़ज़ल
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा
घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगातेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगाहिमवत, जड़, निःस्पन्द हृदय के अन्धकार में जीवन-भय हैतेरे तीक्ष्ण बाण की नोकों पर जीवन-सँचार करेगा।
तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अन्तर में उतरेंगेतेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगेकोपित तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदनरुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन।
सभी उरों के अन्धकार में एक तड़ित वेदना उठेगीतभी सृजन की बीज-वृद्धि हित, जड़ावरण की महि फटेगीशत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अँकुरदंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी।
हे रहस्यमय ! ध्वंस-महाप्रभु, ओ ! जीवन के तेज सनातनतेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सर्जनहम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वन्दनमेरे सर पर एक पैर रख, नाप तीन जग तू असीम बन ।
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