ग़ज़ल
मैं तुम लोगों से दूर हूँ
मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँतुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न हैकि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।
मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है,अकेले में साहचर्य का हाथ है,उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैंकिन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिम्बित हैं, पुरस्कृत हैंइसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है !!सबके सामने और अकेले में।( मेरे रक्त-भरे महाकाव्यों के पन्ने उड़ते हैंतुम्हारे-हमारे इस सारे झमेले में )
असफलता का धूल-कचरा ओढ़े हूँइसलिए कि वह चक्करदार ज़ीनों पर मिलती हैछल-छद्म धन कीकिन्तु मैं सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँजीवन की।फिर भी मैं अपनी सार्थकता से खिन्न हूँविष से अप्रसन्न हूँइसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिएपूरी दुनिया साफ़ करन के लिए मेहतर चाहिएवह मेहतर मैं हो नहीं पातापर , रोज़ कोई भीतर चिल्लाता हैकि कोई काम बुरा नहींबशर्ते कि आदमी खरा होफिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता।रिफ्रिजरेटरों, विटैमिनों, रेडियोग्रेमों के बाहर कीगतियों की दुनिया मेंमेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों मेंपेटों की आँतों में न्यूनों की पीड़ा हैछाती के कोषों में रहितों की व्रीड़ा है
शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य हैशेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम हैसत्य केवल एक जो किदुःखों का क्रम है
मैं कनफटा हूँ हेठा हूँशेव्रलेट-डॉज के नीचे मैं लेटा हूँतेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूँतुम्हारी आज्ञाएँ ढोता हूँ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.