ग़ज़ल
रात, चलते हैं अकेले ही सितारे
रात, चलते हैं अकेले ही सितारे।एक निर्जन रिक्त नाले के पासमैंने एक स्थल को खोदमिट्टी के हरे ढेले निकाले दूरखोदा औरखोदा औरदोनों हाथ चलते जा रहे थे शक्ति से भरपूर।सुनाई दे रहे थे स्वर –बड़े अपस्वरघृणित रात्रिचरों के क्रूर।काले-से सुरों में बोलता, सुनसान था मैदान।जलती थी हमारी लालटैन उदास,एक निर्जन रिक्त नाले के पास।खुद चुका बिस्तर बहुत गहरान देखा खोलकर चेहराकि जो अपने हृदय-साप्यार का टुकड़ाहमारी ज़िंदगी का एक टुकड़ा,
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