ग़ज़ल
ब्रह्मराक्षस
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़परित्यक्त सूनी बावड़ीके भीतरीठण्डे अंधेरे मेंबसी गहराइयाँ जल की...सीढ़ियाँ डूबी अनेकोंउस पुराने घिरे पानी में...समझ में आ न सकता होकि जैसे बात का आधारलेकिन बात गहरी हो।
बावड़ी को घेरडालें खूब उलझी हैं,खड़े हैं मौन औदुम्बर।व शाखों परलटकते घुग्घुओं के घोंसलेपरित्यक्त भूरे गोल।विद्युत शत पुण्यों का आभासजंगली हरी कच्ची गंध में बसकरहवा में तैरबनता है गहन संदेहअनजानी किसी बीती हुई उस श्रेष्ठता का जो किदिल में एक खटके सी लगी रहती।
बावड़ी की इन मुंडेरों परमनोहर हरी कुहनी टेकबैठी है टगरले पुष्प तारे-श्वेत
उसके पासलाल फूलों का लहकता झौंर--मेरी वह कन्हेर...वह बुलाती एक खतरे की तरफ जिस ओरअंधियारा खुला मुँह बावड़ी काशून्य अम्बर ताकता है।
बावड़ी की उन गहराइयों में शून्यब्रह्मराक्षस एक पैठा है,व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज,हड़बड़ाहट शब्द पागल से।गहन अनुमानितातन की मलिनतादूर करने के लिए प्रतिपलपाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रातस्वच्छ करने--ब्रह्मराक्षसघिस रहा है देहहाथ के पंजे बराबर,बाँह-छाती-मुँह छपाछपखूब करते साफ़,फिर भी मैलफिर भी मैल!!
और... होठों सेअनोखा स्तोत्र कोई क्रुद्ध मंत्रोच्चार,अथवा शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार,मस्तक की लकीरेंबुन रहींआलोचनाओं के चमकते तार!!उस अखण्ड स्नान का पागल प्रवाह....प्राण में संवेदना है स्याह!!
किन्तु, गहरी बावड़ीकी भीतरी दीवार परतिरछी गिरी रवि-रश्मिके उड़ते हुए परमाणु, जबतल तक पहुँचते हैं कभीतब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य नेझुककर नमस्ते कर दिया।
पथ भूलकर जब चांदनीकी किरन टकरायेकहीं दीवार पर,तब ब्रह्मराक्षस समझता हैवन्दना की चांदनी नेज्ञान गुरू माना उसे।
अति प्रफुल्लित कण्टकित तन-मन वहीकरता रहा अनुभव कि नभ ने भीविनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी!!
और तब दुगुने भयानक ओज सेपहचान वाला मनसुमेरी-बेबिलोनी जन-कथाओं सेमधुर वैदिक ऋचाओं तकव तब से आज तक के सूत्र छन्दस्, मन्त्र, थियोरम,सब प्रेमियों तककि मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, टॉएन्बीकि हीडेग्गर व स्पेंग्लर, सार्त्र, गाँधी भीसभी के सिद्ध-अंतों कानया व्याख्यान करता वहनहाता ब्रह्मराक्षस, श्यामप्राक्तन बावड़ी कीउन घनी गहराईयों में शून्य।
......ये गरजती, गूँजती, आन्दोलितागहराईयों से उठ रही ध्वनियाँ, अतःउद्भ्रान्त शब्दों के नये आवर्त मेंहर शब्द निज प्रति शब्द को भी काटता,वह रूप अपने बिम्ब से भी जूझविकृताकार-कृतिहै बन रहाध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ
बावड़ी की इन मुंडेरों परमनोहर हरी कुहनी टेक सुनते हैंटगर के पुष्प-तारे श्वेत:::वे ध्वनियाँ!सुनते हैं करोंदों के सुकोमल फूलसुनता है उन्हे प्राचीन ओदुम्बरसुन रहा हूँ मैं वहीपागल प्रतीकों में कही जाती हुईवह ट्रेजिडीजो बावड़ी में अड़ गयी।
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खूब ऊँचा एक जीना साँवला:::उसकी अंधेरी सीढ़ियाँ...वे एक आभ्यंतर निराले लोक की।एक चढ़ना औ' उतरना,पुनः चढ़ना औ' लुढ़कना,मोच पैरों मेंव छाती पर अनेकों घाव।बुरे-अच्छे-बीच का संघर्ष:::वे भी उग्रतरअच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगरगहन किंचित सफलता,अति भव्य असफलता...अतिरेकवादी पूर्णता:::की व्यथाएँ बहुत प्यारी हैं...ज्यामितिक संगति-गणितकी दृष्टि के कृत:::भव्य नैतिक मानआत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक मान......अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना:::कब रहा आसानमानवी अंतर्कथाएँ बहुत प्यारी हैं!!
रवि निकलतालाल चिन्ता की रुधिर-सरिताप्रवाहित कर दीवारों पर,उदित होता चन्द्रव्रण पर बांध देताश्वेत-धौली पट्टियाँउद्विग्न भालों परसितारे आसमानी छोर पर फैले हुएअनगिन दशमलव सेदशमलव-बिन्दुओं के सर्वतःपसरे हुए उलझे गणित मैदान मेंमारा गया, वह काम आया,और वह पसरा पड़ा है...वक्ष-बाँहें खुली फैलींएक शोधक की।
व्यक्तित्व वह कोमल स्फटिक प्रासाद-सा,प्रासाद में जीनाव जीने की अकेली सीढ़ियाँचढ़ना बहुत मुश्किल रहा।वे भाव-संगत तर्क-संगतकार्य सामंजस्य-योजितसमीकरणों के गणित की सीढ़ियाँहम छोड़ दें उसके लिए।उस भाव तर्क व कार्य-सामंजस्य-योजन-शोध मेंसब पण्डितों, सब चिन्तकों के पासवह गुरू प्राप्त करने के लिएभटका!!
किन्तु युग बदला व आया कीर्ति-व्यवसायी...लाभकारी कार्य में से धन,व धन में से हृदय-मन,और, धन-अभिभूत अन्तःकरण में सेसत्य की झाईं:::निरन्तर चिलचिलाती थी।
आत्मचेतस् किन्तु इसव्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन...विश्वचेतस् बे-बनाव!!महत्ता के चरण में थाविषादाकुल मन!मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदितो व्यथा उसकी स्वयं जीकरबताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्यउसकी महत्ता!व उस महत्ता काहम सरीखों के लिए उपयोग,उस आन्तरिकता का बताता मैं महत्व!!
पिस गया वह भीतरीऔ' बाहरी दो कठिन पाटों बीच,ऐसी ट्रेजिडी है नीच!!
बावड़ी में वह स्वयंपागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहावह कोठरी में किस तरहअपना गणित करता रहाऔ' मर गया...वह सघन झाड़ी के कँटीलेतम-विवर मेंमरे पक्षी-साविदा ही हो गयावह ज्योति अनजानी सदा को सो गयीयह क्यों हुआ!क्यों यह हुआ!!मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्यहोना चाहताजिससे कि उसका वह अधूरा कार्य,उसकी वेदना का स्रोतसंगत पूर्ण निष्कर्षों तलकपहुँचा सकूँ।
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