ग़ज़ल

बहुत दिनों से

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों सेबहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहनाऔर कि साथ यों साथ-साथफिर बहना बहना बहनामेघों की आवाज़ों सेकुहरे की भाषाओं सेरंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोनाहै बोल रहा धरती सेजी खोल रहा धरती सेत्यों चाह रहा कहनाउपमा संकेतों सेरूपक से, मौन प्रतीकों से
मैं बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातेंतुमसे चाह रहा था कहना!जैसे मैदानों को आसमान,कुहरे की मेघों की भाषा त्यागबिचारा आसमान कुछरूप बदलकर रंग बदलकर कहे।
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