ग़ज़ल

वे बातें लौट न आएँगी

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
खगदल हैं ऐसे भी कि न जोआते हैं, लौट नहीं आतेवह लिए ललाई नीलापनवह आसमान का पीलापनचुपचाप लीलता है जिनकोवे गुँजन लौट नहीं आतेवे बातें लौट नहीं आतींबीते क्षण लौट नहीं आतेबीती सुगन्ध की सौरभ भर
पर, यादें लौट चली आतींपीछे छूटे, दल से पिछड़ेभटके-भरमे उड़ते खग-सीवह लहरी कोमल अक्षर थीअब पूरा छन्द बन गई है —'तरू-छायाओं के घेरे मेंउदभ्रान्त जुन्हाई के हिलतेछोटे-छोटे मधु-बिम्बों-सीवह याद तुम्हारी आई है' —
पर बातें लौट न आएँगीबीते पल लौट न आएँगे।
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