ग़ज़ल

मुझे कदम-कदम पर

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
मुझे कदम-कदम परचौराहे मिलते हैंबांहें फैलाए!एक पैर रखता हूँकि सौ राहें फूटतीं,मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,बहुत अच्छे लगते हैंउनके तजुर्बे और अपने सपने....सब सच्चे लगते हैं,अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,जाने क्या मिल जाए!
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर मेंचमकता हीरा है,हर एक छाती में आत्मा अधीरा हैप्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है,मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी मेंमहाकाव्य पीडा है,पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ,अजीब है जिंदगी!बेवकूफ बनने की खातिर हीसब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,और यह देख-देख बडा मजा आता हैकि मैं ठगा जाता हूँ...हृदय में मेरे ही,प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा हैहंस-हंसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,कि जगत.... स्वायत्त हुआ जाता है।कहानियां लेकर औरमुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलतेजहां जरा खडे होकरबातें कुछ करता हूँ.... उपन्यास मिल जाते ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.