ग़ज़ल

सहर्ष स्वीकारा है

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
ज़िन्दगी में जो कुछ है, जो भी हैसहर्ष स्वीकारा है;इसलिए कि जो कुछ भी मेरा हैवह तुम्हें प्यारा है।गरबीली ग़रीबी यह, ये गंभीर अनुभव सबयह विचार-वैभव सबदृढ़्ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सबमौलिक है, मौलिक हैइसलिए के पल-पल मेंजो कुछ भी जाग्रत है अपलक है--संवेदन तुम्हारा है !!
जाने क्या रिश्ता है,जाने क्या नाता हैजितना भी उँड़ेलता हूँ,भर भर फिर आता हैदिल में क्या झरना है?मीठे पानी का सोता हैभीतर वह, ऊपर तुममुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भरमुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!
सचमुच मुझे दण्ड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैंतुम्हें भूल जाने कीदक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्याशरीर पर,चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैंझेलूँ मै, उसी में नहा लूँ मैंइसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादितरहने का रमणीय यह उजेला अबसहा नहीं जाता है।नहीं सहा जाता है।ममता के बादल की मँडराती कोमलता--भीतर पिराती हैकमज़ोर और अक्षम अब हो गयी है आत्मा यहछटपटाती छाती को भवितव्यता डराती हैबहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नही होती है !!!
सचमुच मुझे दण्ड दो कि हो जाऊँपाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों मेंधुएँ के बाद्लों मेंबिलकुल मैं लापता!!लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है!!इसलिए कि जो कुछ भी मेरा हैया मेरा जो होता-सा लगता है, होता सा संभव हैसभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव हैअब तक तो ज़िन्दगी में जो कुछ था, जो कुछ हैसहर्ष स्वीकारा हैइसलिए कि जो कुछ भी मेरा हैवह तुम्हें प्यारा है ।
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