ग़ज़ल
मेरे जीवन की
मेरे जीवन की धर्म तुम्ही--यद्यपि पालन में रही चूकहे मर्म-स्पर्शिनी आत्मीये!
मैदान-धूप में--अन्यमनस्का एक औरसिमटी छाया-सा उदासीनरहता-सा दिखता हूँ यद्यपि खोया-खोयानिज में डूबा-सा भूला-सालेकिन मैं रहा घूमता भीकर अपने अन्तर में धारणप्रज्ज्वलित ज्ञान का विक्षोभीव्यापक दिन आग बबूला-सामैं यद्यपि भूला-भूला साज्यों बातचीत के शब्द-शोर में एक वाक्यअनबोला-सा!मेरे जीवन की तुम्ही धर्म(मैं सच कह दूँ--यद्यपि पालन में चूक रही)नाराज़ न हो सम्पन्न करोयह अग्नि-विधायक प्राण-कर्महे मर्म-स्पर्शिनी सहचारिणि!
था यद्यपि भूला-भूला सापर एक केन्द्र की तेजस्वी अन्वेष-लक्ष्यआँखों से उर में लाखों कोअंकित करता तौलता रहामापता रहाआधुनिक हँसी के सभ्य चाँद का श्वेत वक्षखोजता रहा उस एक विश्वके सारे पर्वत-गुहा-गर्तमैंने प्रकाश-चादर की मापी उस पर पीली गिरी पर्तउस एक केन्द्र की आँखों से देखे मैंनेएक से दूसरे में घुसकरआधुनिक भवन के सभी कक्षउस एक केन्द्र के ही सम्मुखमैं हूँ विनम्र-अन्तर नत-मुखज्यों लक्ष्य फूल-पत्तों वाली वृक्ष की शाखआज भी तुम्हारे वातायान में रही झाँकसुख फैली मीठी छायाओं के सौ सुख!
मेरे जीवन का तुम्ही धर्मयद्यपि पालन में रही चूकहे मर्म-स्पर्शिनी आत्मीये!सच है कि तुम्हारे छोह भरीव्यक्तित्वमयी गहरी छाँहों से बहुत दूरमैं रहा विदेशों में खोया पथ-भूला साअन-खोला हीवक्ष पर रहा लौह-कवचबाहर के ह्रास मनोमय लोभों लाभों सेहिय रहा अनाहत स्पन्दन सच,ये प्राण रहे दुर्भेद्य अथकआधुनिक मोह के अमित रूप अमिताभों से।
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