ग़ज़ल

लकड़ी का रावण

गजानन माधव मुक्तिबोध · सब कलाम देखें
दीखतात्रिकोण इस पर्वत-शिखर सेअनाम, अरूप और अनाकारअसीम एक कुहरा,भस्मीला अन्धकारफैला है कटे-पिटे पहाड़ी प्रसारों पर;लटकती हैं मटमैलीऊँची-ऊँची लहरेंमैदानों पर सभी ओर
लेकिन उस कुहरे से बहुत दूरऊपर उठपर्वतीय ऊर्ध्वमुखी नोक एकमुक्त और समुत्तुंग !!
उस शैल-शिखर परखड़ा हुआ दीखता है एक द्योः पिता भव्यनिःसंगध्यान-मग्न ब्रह्म...मैं ही वह विराट् पुरुष हूँसर्व-तन्त्र, स्वतन्त्र, सत्-चित् !मेरे इन अनाकार कन्धों पर विराजमानखड़ा है सुनीलशून्यरवि-चन्द्र-तारा-द्युति-मण्डलों के परे तक ।
दोनों हमअर्थात्मैं व शून्यदेख रहे...दूर...दूर...दूर तकफैला हुआमटमैली जड़ीभूत परतों कालहरीला कम्बल ओर-छोर-हीनरहा ढाँककन्दरा-गुहाओं को, तालों कोवृक्षों के मैदानी दृश्यों के प्रसार को
अकस्मात्दोनों हममैं वह शून्यदेखते कि कम्बल की कुहरीली लहरेंहिल रही, मुड़ रही !!क्या यह सच,कम्बल के भीतर है कोई जोकरवट बदलता-सा लग रहा ?आन्दोलन ?नहीं, नहीं मेरी ही आँखों का भ्रम हैफिर भी उस आर-पार फैले हुएकुहरे में लहरीला असंयम !!हाय ! हाय !
क्या है यह !! मेरी ही गहरी उसाँस मेंकौन-सा है नया भाव ?क्रमशःकुहरे की लहरीली सलवटेंमुड़ रही, जुड़ रही,आपस में गुँथ रही !!क्या है यह !!यर क्या मज़ाक है,अरूर अनाम इसकुहरे की लहरों से अगनितकइ आकृति-रूपबन रहे, बनते-से दीखते !!कुहरीले भाफ भरे चहरेअशंक, असंख्य व उग्र...अजीब है,अजीबोगरीब हैघटना का मोड़ यह ।
अचानकभीतर के अपने से गिरा कुछ,खसा कुछ,नसें ढीली पड़ रहीकमज़ोरी बढ़ रही; सहसाआतंकित हम सबअभी तकसमुत्तुंग शिखरों पर रहकरसुरक्षित हम थेजीवन की प्रकाशित कीर्ति के क्रम थे,अहं-हुंकृति के ही...यम-नियम थे,अब क्या हुआ यहदुःसह !!सामने हमारेघनीभूत कुहरे के लक्ष-मुखलक्ष-वक्ष, शत-लक्ष-बाहु ये रूप, अरेलगते हैं घोरतर ।
जी नहीं,वे सिर्फ कुहरा ही नहीं है,काले-काले पत्थरव काले-काले लोहे के लगते वे लोग ।
हाय, हाय, कुहरे की घनीभूत प्रतिमा याभरमाया मेरा मन,उनके वे स्थूल हाथमनमाने बलशालीलगते हैं ख़तरनाक;जाने-पहचाने-से लगते हैं मुख वे ।
डरता हूँ,उनमें से कोई, हायसहसा न चढ़ जायउत्तुंग शिखर की सर्वोच्च स्थिति पर,पत्थर व लोहे के रंग का यह कुहरा !
बढ़ न जायँछा न जायँमेरी इस अद्वितीयसत्ता के शिखरों पर स्वर्णाभ,हमला न कर बैठे ख़तरनाककुहरे के जनतन्त्रीवानर ये, नर ये !!समुदाय, भीड़डार्क मासेज़ ये मॉब हैं,हलचलें गड़बड़,नीचे थे तब तकफ़ासलों में खोये हुए कहीं दूर, पार थे;कुहरे के घने-घने श्याम प्रसार थे ।अब यह लंगूर हैंहाय हायशिखरस्थ मुझको ये छू न जायँ !!
आसमानी शमशीरी, बिजलियों,मेरी इन भुजाओं में बन जाओब्रह्म-शक्ति !पुच्छल ताराओं,टूट पड़ो बरसोकुहरे के रंग वाले वानरों के चहरेविकृत, असभ्य और भ्रष्ट हैं...प्रहार करो उन पर,कर डालो संहार !!
अरे, अरे !नभचुम्बी शिखरों पर हमारेबढ़ते ही जा रहेजा रहे चढ़तेहाय, हाय,सब ओर से घिरा हूँ ।
सब तरफ़ अकेला,शिखर पर खड़ा हूँ ।लक्ष-मुख दानव-सा, लक्ष-हस्त देव सा ।परन्तु, यह क्याआत्म-प्रतीति भी धोखा ही दे रही !!स्वयं को ही लगता हूँबाँस के व कागज़ के पुट्ठे के बने हुएमहाकाय रावण-सा हास्यप्रदभयंकर !!
हाय, हाय,उग्रतर हो रहा चेहरों का समुदायऔर कि भाग नहीं पाता मैंहिल नहीं पाता हूँमैं मन्त्र-कीलि-सा, भूमि में गड़ा-सा,जड़ खड़ा हूँअब गिरा, तब गिराइसी पल कि उल पल...
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