ग़ज़ल
पूंजीवादी समाज के प्रति
इतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धिइतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धिइतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्तियह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्तिइतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंधइतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –केवल एक जलता सत्य देने टाल।छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंधतेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंधदेती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोधतेरे रक्त में भी सत्य का अवरोधतेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्रतुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्रतेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्रतेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एकअपनी उष्णता में धो चलें अविवेकतू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थतेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.