ग़ज़ल

हम समझते हैं आज़माने को

मोमिन ख़ाँ मोमिन · सब कलाम देखें
हम समझते हैं आज़माने कोउज्र कुछ चाहिए सताने को
सुबहे-इशरत है न वह शामे-विसालहाय क्या हो गया ज़माने को
बुलहवस रोये मेरे गिरियाँ पे अबमुँह कहाँ तेरे मुस्कुराने को
बर्क़ का आसमाँ पर है दिमाग़फूँक कर मेरे आशियाने को
रोज़े-मशहर भी होश अगर आयाजायेंगे हम शराबख़ाने को
कोई दिन हम जहाँ में बैठे हैंआसमाँ के सितम उठाने को
संग-ए-दर से तेरे निकाली आगहमने दुश्मन का घर जलाने को
चल के का'बे में सिजदा कर 'मोमिन'छोड़ उस बुत के आस्ताने को
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