ग़ज़ल

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम

मोमिन ख़ाँ मोमिन · सब कलाम देखें
ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हमपर क्या करें कि हो गये नाचार जी से हम
हँसते जो देखते हैं किसी को किसी से हममुँह देख-देख रोते हैं किस बेकसी से हम
उस कू में जा मरेंगे मदद ऐ हुजूमे-शौक़आज और ज़ोर करते हैं बेताक़ती से हम
साहब ने इस ग़ुलाम को आज़ाद कर दियालो बन्दगी कि छूट गए बन्दगीसे हम
बे-रोये मिस्ले-अब्र न निकला ग़ुबारे-दिलकहते थे उनको बर्क़े-तबस्सुम हँसी से हम
मुँह देखने से पहले भी किस दिन वह साफ़ थेबे-वजह क्यों ग़ुबार रखें आरसी से हम
है छेड़ इख़्तलात भी ग़ैरों के सामनेहँसने के बदले रोयें न क्यों गुदगुदी से हम
क्या दिल को ले गया कोई बेग़ाना-अश्नाक्यों अपने जी को लगते हैं कुछ अजनबी से हम
इन नातवानियों पे भी थे ख़ारे-राहे-ग़ैरक्योंकर निकाले जाते न उसकी गली से हम
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