ग़ज़ल

तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर ले

मोमिन ख़ाँ मोमिन · सब कलाम देखें
तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर लेहम तो कल ख्वाब-ए-अदम1 में शब-ए-हिजराँ2 होंगे
एक हम हैं कि हुए ऎसे पशेमान3 कि बसएक वो हैं कि जिन्हें चाह4 के अरमाँ होंगे
हम निकालेंगे सुन ऐ मौज-ए-सबा5 बल तेराउसकी ज़ुल्फ़ों के अगर बाल परेशाँ होंगे
फिर बहार आई वही दश्त नवरदी6 होगीफिर वही पाँव वही खार-ए-मुग़ीलाँ7 होंगे
मिन्नत-ए-हज़रत-ए-ईसा8 न उठाएँगे कभीज़िन्दगी के लिए शर्मिन्दा-ए-एहसाँ9 होंगे?
उम्र तो सारी क़टी इश्क़-ए-बुताँ10 में 'मोमिन'आखिरी उम्र में क्या खाक मुसलमाँ होंगे
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