ग़ज़ल
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुएजोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किए हुए
करता हूँ जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त कोअरसा हुआ है दावत-ए-मिज़्गाँ किए हुए
माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवसज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशाँ किए हुए
चाहे है फिर किसी को मुक़ाबिल में आरज़ूसुरमे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़्गाँ किए हुए
इक नौ-बहार-ए-नाज़ को ताक़े है फिर निगाहचेहरा फ़रोग़-ए-मय से गुलिस्ताँ किए हुए
फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहेंसर ज़ेर-ए-बार-ए-मिन्नत-ए-दरबाँ किए हुए
जी ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिनबैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए
ग़ालिब हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क सेबैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किए हुए
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