ग़ज़ल
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपनाबन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़-दाँ अपना
मय वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रबआज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना
मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकतेअर्श से उधर होता काश-के मकाँ अपना
दे वो जिस क़दर ज़िल्लत हम हँसी में टालेंगेबारे आश्ना निकला उन का पासबाँ अपना
दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक जाऊँ उन को दिखला दूँउंगलियाँ फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूँ-चकाँ अपना
घिसते घिसते मिट जाता आप ने अबस बदलानंग-ए-सज्दा से मेरे संग-ए-आस्ताँ अपना
ता करे न ग़म्माज़ी कर लिया है दुश्मन कोदोस्त की शिकायत में हम ने हम-ज़बाँ अपना
हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थेबे-सबब हुआ ग़ालिब दुश्मन आसमाँ अपना