ग़ज़ल

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सहीमेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही
हम भी दुश्मन तो नहीं हैं अपनेग़ैर को तुझ से मोहब्बत ही सही
अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ होआगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही
उम्र हर-चंद कि है बर्क़-ए-ख़िरामदिल के ख़ूँ करने की फ़ुर्सत ही सही
हम कोई तर्क-ए-वफ़ा करते हैंन सही इश्क़ मुसीबत ही सही
कुछ तो दे ऐ फ़लक-ए-ना-इंसाफ़आह-ओ-फ़रियाद की रुख़्सत ही सही
यार से छेड़ चली जाए असदगर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही
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