ग़ज़ल
इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई
इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोईमेरे दुख की दवा करे कोई
शरअ-ओ-आईं पर मदार सहीऐसे क़ातिल का क्या करे कोई
चाल जैसे कड़ी कमान का तीरदिल में ऐसे के जा करे कोई
बात पर वाँ ज़बान कटती हैवो कहें और सुना करे कोई
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या कुछकुछ न समझे ख़ुदा करे कोई
न सुनो गर बुरा कहे कोईन कहो गर बुरा करे कोई
रोक लो गर ग़लत चले कोईबख़्श दो गर ख़ता करे कोई
कौन है जो नहीं है हाजत-मंदकिस की हाजत रवा करे कोई
क्या किया ख़िज़्र ने सिकंदर सेअब किसे रहनुमा करे कोई
जब तवक़्क़ो ही उठ गई 'ग़ालिब'क्यूँ किसी का गिला करे कोई
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