ग़ज़ल

है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशान और

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशान औरकरते हैं मोहब्बत तो गुज़रता है गुमान और
या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बातदे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बान और
अबरू से है क्या उस निगह-ए-नाज़ को पैवंदहै तीर मुक़र्रर मगर इस की है कमान और
तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगेले आएँगे बाज़ार से जा कर दिल-ओ-जान और
हर-चंद सुबुक-दस्त हुए बुत-शिकनी मेंहम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिराँ और
है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोताहोते जो कई दीदा-ए-ख़ूँ-नाबा-फ़शाँ और
मरता हूँ इस आवाज़ पे हर-चंद सर उड़ जाएजल्लाद को लेकिन वो कहे जाएँ कि हाँ और
लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब का धोकाहर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ और
लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैनकरता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ान और
पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नालेरुकती है मिरी तबा तो होती है रवाँ और
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छेकहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
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