ग़ज़ल

फिर हुआ वक़्त कि हो बाल कुशा मौजे-शराब

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
फिर हुआ वक़्त कि हो बालकुशामौजे-शराबदे बते मयको दिल-ओ-दस्ते शना मौजे-शराब
पूछ मत वजहे-सियहमस्ती-ए-अरबाबे-चमनसाया-ए-ताक में होती है हवा मौजे-शराब
है ये बरसात वो मौसम कि अजब क्या है अगरमौजे-हस्ती को करे फ़ैज़े-हवा मौजे शराब
जिस क़दर रूहे-नबाती है जिगर तश्ना-ए-नाज़दे है तस्कींब-दमे- आबे-बक़ा मौजे-शराब
बस कि दौड़े है रगे-ताक में ख़ूँ हो-हो करशहपरे-रंग से है बालकुशा मौजे-शराब
मौज-ए-गुल से चराग़ाँ है गुज़रगाहे ख़यालहै तसव्वुर में जिबस जल्वानुमा मौजे-शराब
नश्शे के पर्दे में है मह्वे तमाशा -ए-दिमाग़बस कि रखती है सरे- नश-ओ-नुमा मौजे शराब
एक आलम पे है तूफ़ानी-ए-कैफ़ीयते-फ़स्लमौज -ए-सब्ज़ा-ए-नौख़ेज़ से ता मौजे-शराब
शरहे -हंगामा-ए-हस्ती है, ज़हेमौसमे-गुलरहबरे-क़तरा ब-दरिया है ख़ुशामौजे-शराब
होश उड़ते हैं मेरे जल्वा-ए-गुल देख असदफिर हुआ वक़्त कि हो बालकुशा मौजे-शराब
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