ग़ज़ल
ज़हर-ए-ग़म कर चुका था मेरा काम
न होगा यक बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेराहुबाब-ए-मौज-ए-रफ़्तार है, नक़्श-ए-क़दम मेरा
मुहब्बत थी चमन से, लेकिन अब ये बेदिमाग़ी हैके मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा
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