ग़ज़ल

गरम-ए-फ़रयाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
गरम-ए फ़रयाद रखा शकल-ए निहाली ने मुझेतब अमां हिजर में दी बरद-ए लियाली ने मुझे
निसयह-ओ-नक़द-ए दो-आलम की हक़ीक़त म'लूमले लिया मुझ से मिरी हिममत-ए-आली ने मुझे
कसरत-आराई-ए वहदत है परसतारी-ए-वहमकर दिया काफ़िर इन असनाम-ए ख़याली ने मुझे
हवस-ए-गुल के तसववुर में भी खटका न रहाअजब आराम दिया बे-पर-ओ-बाली ने मुझे--ज़िंदगी में भी रहा ज़ौक़-ए-फ़ना का मारानशशह बख़शा ग़ज़ब उस साग़र-ए ख़ाली ने मुझे
बसकि थी फ़सल-ए ख़िज़ान-ए-चमनिसतान-ए-सुख़नरनग-ए शुहरत न दिया ताज़ह-ख़याली ने मुझे
जलवा-ए-ख़वुर से फ़ना होती है शबनम ग़ालिबखो दिया सतवत-ए असमा-ए-जलाली ने मुझे
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh