ग़ज़ल
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैंकभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं
वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं
नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू कोये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं
तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखेंहम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं
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