ग़ज़ल
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशींइक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये
वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़बवो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये
सब्रआज़्मा वो उन की निगाहें के हफ़ नज़रताक़तरूबा वो उन का इशारा के हाये हाये
वो मेवा हाये ताज़ा-ए-शीरीं के वाह वाहवो बादा हाये नाब-ए-गवारा के हाये हाये
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