ग़ज़ल
मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूर
मुझ को दयार-ए-ग़ैर में मारा वतन से दूररख ली मिरे ख़ुदा ने मिरी बेकसी की शर्म
वह हल्क़ा-हा-ए-ज़ुल्फ़ कमीं में हैं या ख़ुदारख लीजो मेरे दावा-ए-वारस्तगी की शर्म
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