ग़ज़ल
कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए
कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आएयक मरतबा घबरा के कहो कोई कि वो आए
हूँ कशमकश-ए-नज़ा में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बतकुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए
है साइक़ा-ओ-शोला-ओ-सीमाब का आलमआना ही समझ में मिरी आता नहीं गो आए
ज़ाहिर है कि घबरा के न भागेंगे नकीरेंहां मुंह से मगर बादा-ए-दोशीना की बो आए
जललाद से डरते हैं न वाइज़ से झगड़तेहम समझे हुए हैं उसे जिस भेस में जो आए
हां अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़तदेखा कि वह मिलता नहीं अपने ही को खो आए
अपना नहीं वह शेवह कि आराम से बैठेंउस दर पह नहीं बार तो क`बे ही को हो आए
की हम-नफ़सों ने असर-ए गिरयह में तक़रीरअचछे रहे आप उस से मगर मुझ को डुबो आए
उस अनजुमन-ए नाज़ की कया बात है ग़ालिबहम भी गए वां और तिरी तक़दीर को रो आए
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