ग़ज़ल

कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइये

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइएबे-तकल्लुफ़ ऐ शरार-ए-जस्ता क्या हो जाइए
बैज़ा-आसा नंग-ए-बाल-ओ-पर है ये कुंज-ए-क़फ़सअज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी हो गर रिहा हो जाइए
---वुसअत-ए-मशरब नियाज़-ए-कुल्फ़त-ए-वहशत असदयक-बयाबाँ साया-ए-बाल-ए-हुमा हो जाइए
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