ग़ज़ल
आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
आ कि मेरी जान को क़रार नहीं हैताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है
देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदलेनश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है
गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझ कोहाये! कि रोने पे इख़्तियार नहीं है
हम से अबस है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिरख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुब्बार नहीं है
दिल से उठा लुत्फे-जल्वाहा-ए-म'आनीग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है
क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारेवाये! अगर अहद उस्तवार नहीं है
तू ने क़सम मैकशी की खाई है "ग़ालिब"तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है
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