ग़ज़ल
बिजली इक कौंद गयी आँखों के आगे तो क्या
बिजली इक कौंद गयी आँखों के आगे तो क्या,बात करते कि मैं लब तश्नए-तक़रीर भी था ।पकड़े जाते हैं फरिश्तों के लिखे पर नाहक़,आदमी कोई हमारा, दमे-तहरीर भी था ?
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