ग़ज़ल

जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआ

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जादा-ए-रह ख़ुर को वक़्त-ए-शाम है तार-ए-शुआचर्ख़ वा करता है माह-ए-नौ से आग़ोश-ए-विदा
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