ग़ज़ल

अफ़सोस कि दनदां का किया रिज़क़ फ़लक ने

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
अफ़सोस कि दनदां का किया रिज़क़ फ़लक नेजिन लोगों की थी दर-ख़ुर-ए-अक़्द-ए-गुहर अंगुश्त
काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देनाख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त
लिखता हूं असद सोज़िश-ए दिल से सुख़न-ए गरमता रख न सके कोई मिरे हरफ़ पर अनगुशत
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