ग़ज़ल

न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सबज़-ए-ख़त से

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
न लेवे गर ख़स-ए-जौहर तरावत सब्ज़ा-ए-ख़त सेलगावे ख़ाना-ए-आईना में रू-ए-निगार आतिश
फ़रोग़-ए-हुस्न से होती है हल्ल-ए-मुश्किल-ए-आशिक़न निकलते शम्अ के पा से निकाले गर न ख़ार आतिश
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh