ग़ज़ल

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी

मिर्ज़ा ग़ालिब · सब कलाम देखें
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकलेबहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन परवो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिनबहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
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