ग़ज़ल
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तककौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताबदिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिनख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक
ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़-मर्ग इलाजशम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक