ग़ज़ल
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआमैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
जम्अ करते हो क्यूँ रक़ीबों कोइक तमाशा हुआ गिला न हुआ
हम कहाँ क़िस्मत आज़माने जाएँतू ही जब ख़ंजर-आज़मा न हुआ
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीबगालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ
है ख़बर गर्म उन के आने कीआज ही घर में बोरिया न हुआ
क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थीबंदगी में मिरा भला न हुआ
जान दी दी हुई उसी की थीहक़ तो यूँ है कि हक़ अदा न हुआ
कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैंआज 'ग़ालिब' ग़ज़ल-सरा न हुआ
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