ग़ज़ल
दायम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं
दायम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैंख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं
क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिलइंसान हूँ प्याला-ओ-साग़र नहीं हूँ मैं
या रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिएलौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुकर्रर नहीं हूँ मैं
हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्तेआख़िर गुनाहगार हूँ काफ़िर नहीं हूँ मैं
किस वास्ते अज़ीज़ नहीं जानते मुझेलाल-ओ-ज़मर्रुद-ओ-ज़र-ओ-गौहर नहीं हूँ मैं
रखते हो तुम क़दम मिरी आँखों से क्यूँ दरेग़रुतबे में मेहर-ओ-माह से कमतर नहीं हूँ मैं
करते हो मुझ को मनअ-ए-क़दम-बोस किस लिएक्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मैं
ग़ालिब वज़ीफ़ा-ख़्वार हो दो शाह को दुआवो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं